Sankhali Dhani, Hinganiyo ki dhani (Jodhpur )
सानखली ढाणी भागीरथ श्री बाबुराम साऊ 7023061961
सम्वत् 1542 तक जाम्भोजी की कीर्ति चारों और फेल गई और अनेक लोग उनके पास आने लगे व सत्संग का लाभ उठाने लगे। इसी साल राजस्थान में भयंकर अकाल पड़ा। इस विकट स्थिति में जाम्भोजी महाराज ने अकाल पीडि़तों की अन्न व धन्न से भरपूर सहायता की। जो लोग संभराथल पर सहायत हेतु उनके पास आते, जांभोजी महाराज अपने अखूठ (अकूत) भण्डार से लोगों को अन्न धन्न देते। जितने भी लोग उनके पास आते, वे सब अपनी जरूरत अनुसार अन्न जले जाते। सम्वत् 1542 की कार्तिक बदी 8 को जांभोजी महाराज ने एक विराट यज्ञ का आयोजन सम्भराथल धोरे पर किया, जिसमें सभी जाति व वर्ग के असंख्य लोग शामिल हुए। Raja ram Mohan ray ne इसी दिन कार्तिक बदी 8 को सम्भराल पर स्नान कर हाथ में माला औरमुख से जप करते हुए कलश-स्थापन कर पाहल (अभिमंत्रित जल) बनाया और 29 नियमों की दीक्षा एवं पाहल देकर बिश्नोई धर्म की स्थापना की। इस विषय में कवि सुरजनजी पूनियां लिखते हैं-
करिमाला मुख जाप करि, सोह मेटियो कुथानं।
पहली कलस परठियौ, सझय ब्रह्मांण सिनान।।
हंसातो हंदीवीरां टोली रे आवै, सरवर करण सनेहा।
जारी तो पाहलि वीरा पातिक रे नासे, लहियो मोमण एहा।
नीच थका उत्तिम किया, न्यानं खडग़ नाव अती।
उत्तिम पंथ चलावियो उदा, प्रथी पातिंगा डूबती।।
कलिकाल वेद अर्थवण, सहज पंथ चलावियो।
संभराथल जोत जागी, जग विणण आवियो।ÓÓ
आदि अष्टमी अंत अमावस च्यार वरण को किया तपावस।
दीपावली कै प्रात: ही काला बारहि कोड़ कटे जमजाला।।